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अविश्वास प्रस्ताव पर INDIA को लग सकता है झटका, सेंध लगाने की तैयारी में NDA

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नई दिल्ली
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के खिलाफ विपक्ष द्वारा लाए जा रहे अविश्वास प्रस्ताव पर सत्तारूढ़ एनडीए पलटवार करने की तैयारी में है। एनडीए की संख्या को देखते हुए इस प्रस्ताव का नतीजा तय है, लेकिन एनडीए की कोशिश इस पर विपक्ष के नए बने गठबंधन इंडिया में सेंध लगाकर इसकी कमजोरियों को उजागर करने की है। सरकार की कोशिश पांच साल पहले मोदी सरकार के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव से ज्यादा अंतर से जीत की है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में विपक्ष द्वारा लाया जा रहा यह पहला अविश्वास प्रस्ताव है। इससे पहले मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में जुलाई, 2018 में कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव लाया था। तब इस अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में सिर्फ 126 वोट पड़े थे, जबकि इसके खिलाफ 325 सांसदों ने मत दिया था। इस बार सदन का संख्या बल एनडीए के पक्ष में ज्यादा है।

संख्याबल में एनडीए को बड़ी बढ़त
एनडीए के पास अपने 332 सांसदों का समर्थन है। विपक्षी गठबंधन से बाहर खड़े दलों का अगर समर्थन मिलता है तो यह संख्या और बढ़ सकती है। कांग्रेस के साथ बने विपक्षी गठबंधन के साथ लगभग 153 सांसद हैं। जबकि दोनों गठबंधनों से दूर दलों के पास 53 सांसद हैं। पांच सीटें खाली हैं। इनमें शिवसेना और एनसीपी को लेकर अभी स्थिति साफ नहीं है। ये दोनों दल बंट चुके हैं। ऐसे में व्हिप जारी होने पर इन दलों के दोनों खेमे कैसे मतदान करेंगे साफ नहीं है। शिवसेना के 19 सांसदों में भाजपा के साथ शिवसेना शिंदे के 13 सांसद हैं, जबकि शिवसेना उद्धव के साथ छह सांसद हैं। इसी तरह से एनसीपी के पांच सांसदों में भाजपा के साथ वाले एनसीपी अजीत के साथ तीन और एनसीपी शरद के साथ दो सांसद हैं।

भावी रणनीति को लेकर अहम
इस अविश्वास प्रस्ताव के जरिये जहां विपक्ष मोदी सरकार को घेरने की कोशिश के साथ अपनी एकजुटता, खासकर नए बने गठबंधन इंडिया की ताकत को दिखाएगा, वहीं एनडीए की कोशिश विपक्षी खेमे में सेंध लगाने की होगी। सूत्रों के अनुसार, भाजपा की कोशिश विपक्षी खेमे में सेंध लगाने की है। मतदान के समय अगर इस खेमे के कुछ दल या कुछ सांसद टूटते हैं या सदन से बाहर रहते हैं तो वह भी भाजपा के लिए काफी लाभदायक और विपक्ष के लिए नुकसानदेह हो सकता है। इसके अलावा, इंडिया से बाहर वाले विपक्षी दलों के सामने समर्थन और विरोध के साथ सदन से वॉकआउट करने का भी विकल्प होगा। अगर इनमें कुछ दल भाजपा के साथ आते हैं तो वह भी भावी रणनीति के लिहाज से काफी अहम होगा।