स्वतंत्र तिवारी – 9752023023
बिलासपुर संभाग / राजनीतिक गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर सुर्खियां बटोर रही हैं, जिससे बड़े राजनीतिक दलों को सोचने मजबूर कर दिया हैं।
राजनीति में वफादारी और अवसरवाद के बीच की लकीर कितनी पतली होती है, इसका जीता-जागता उदाहरण एक बार फिर सामने आया है। जिस यूनिवर्सिटी के छात्र संघ, युवाओं और साख के दम पर नेताजी ने अपनी सियासत चमकाई, विधानसभा की चौखट लांघी और विधायक बने… विधायक बनते ही उसी मातृ-संस्था यूनिवर्सिटी को दरकिनार करने लग गए, नतीजा यह हुआ कि यूनिवर्सिटी ने विधायक महोदय से दूरी बनानी शुरू कर दी, जिसके चलते 2023 के विधानसभा चुनाव में लगभग 30 हजार वोटों से ये विधायक महोदय पराजित हुए, ये वहीं पूर्व विधायक हैं जो पहली बार 2018 के विधानसभा चुनाव में करीब 11 हजार वोटों से विजयी हुए और विधायक बनने के बाद से खुद से ये महोदय खुद को सबसे बड़ा और ऊंचा मानने लगे। मनमानी, निष्क्रियता, फर्जी डिग्री बेचने के आरोपों ने इन्हें 2023 के चुनाव में जबरदस्त शिकस्त दी।
प्राप्त जानकारी के अनुसार कई राजनीतिक पार्टीयों के नेता इस पूर्व विधायक को पैराशूट विधायक भी कहते थे। जो सोशल मीडिया में भी वायरल बताया जा रहा हैं।
चर्चा है कि इस पूर्व विधायक ने अब एक नई, लेकिन बेहद विवादित यूनिवर्सिटी में अपनी घुसपैठ की बिसात बिछा दी है। और इस पूरे खेल के पीछे कोई बाहरी दिमाग नहीं, बल्कि राजनीति की सुपरहिट ‘जीजा-साले’ की जोड़ी हैं, जिनका टारगेट सीधे मिशन 2028 का विधानसभा चुनाव हैं।
जिस नये यूनिवर्सिटी की आड़ में पूर्व विधायक महोदय 2028 में विधायक बनने का सपना देख रहे हैं, वो बहुत ही विवादित यूनिवर्सिटी हैं, जिसकी शिकायत राज्यपाल, छत्तीसगढ़ शासन से भी हुई थी, जिसमें जांच व कार्यवाही लंबित बताया जा रहा हैं, इस यूनिवर्सिटी के फर्जीवाड़े का खुलासा भी “दैनिक भारत-भास्कर” ने किया था, और आगे भी करता रहेगा ।
‘मातृ’ संस्था को ठेंगा, विवादित से यारी…
अंदरखाने से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, विधायक जी को अच्छी तरह से अहसास है कि पुरानी यूनिवर्सिटी ने उन्हें जो देना था, वो दे दिया। अब वहां से आगे का राजनीतिक माइलेज निकालना मुश्किल हो रहा है। इसलिए, अब नजर एक ऐसी यूनिवर्सिटी पर है जो अपनी अकादमिक उपलब्धियों से ज्यादा विवादों, अंदरूनी राजनीति और भारी-भरकम फंडिंग्स के लिए जानी जाती हैं, जहां वह अपनी जड़ें जमा सियासी दावपेंच खेल सके।
रणनीति साफ हैं वोट बैंक की नई नर्सरी…
यह पूर्व विवादित विधायक इस विवादित यूनिवर्सिटी के जरिए नए और आक्रामक युवा चेहरों को अपने पाले में करने की योजना बना रहा हैं, ज्यादा से ज्यादा भर्ती करा, डिग्री उपलब्ध कराने का जाल बिछा युवाओं को भटकाने की बड़ी प्लानिंग हो रही हैं। विवादित संभ्रांतों के बीच पैठ बनाकर आगामी चुनावों के लिए तगड़ा बैकअप तैयार करने की कोशिश की जा रही हैं।
’जीजा-साले’ का ‘मिशन 2028’…
इस पूरी ‘घुसपैठ’ की स्क्रिप्ट को लिखने वाले मास्टरमाइंड पूर्व विधायक जी स्वयं बताए जा रहे हैं, राजनीति के चतुर सुजान साले साहब ने जीजा जी को यूनिवर्सिटी के बड़े ओहदे में तो बैठा दिया, संभावना यह भी हैं कि यूनिवर्सिटी में पूर्व विधायक महोदय का भी अभी शेयर लगने लगा है, क्योंकि यूनिवर्सिटी में इनका अचानक से आनाजाना लोगों के मन में कई शंकाये पैदा कर रहा हैं।
2028 का रोडमैप अभी से तैयार कर लिया है…
2028 की वैतरणी पार करने के लिए जीजा-साले की जोड़ी को इस वक्त एक ऐसे ही कड़क और विवादित प्लेटफॉर्म की जरूरत थी, जहां ध्रुवीकरण और पब्लिसिटी मुफ्त में मिले।”
सियासी गलियारों में सुगबुगाहट…क्या दांव पड़ेगा उल्टा ?
इस नए कदम से विधायक जी के पुराने वफादार और उस यूनिवर्सिटी के छात्र बेहद आहत हैं जिसने उन्हें शून्य से शिखर पर पहुंचाया। कार्यकर्ताओं के बीच दबी जुबान में बगावत के सुर हैं, ‘जब अपने गढ़ के सगे नहीं हुए, तो विवादित गढ़ में कब तक टिकेंगे ?’
अब देखना दिलचस्प होगा कि जीजा-साले की यह ‘जुगलबंदी’ और 2028 की यह एडवांस प्लानिंग विधायक जी को दोबारा विधानसभा पहुंचाती है, या फिर इस ‘विवादित घुसपैठ’ के दलदल में उनकी सियासी कश्ती डूब जाती है। जानकारी के मुताबिक जीजा-साले भले एक हैं पर दोनों अलग अलग राजनीतिक पार्टियों में दखल रखते हैं, ऐसे में सभी पार्टीयों को अलर्ट रहना पड़ेगा।
टिकट के लिए अभी से जीहुजूरी…
चुनाव हारने के बाद पूर्व विधायक करीब दो वर्षों से कहीं नजर नहीं आये, पर अब कुछ दिनों से अपने आका नेताओं से कुछ ज्यादा करीब होने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि माना जाता हैं कि विधानसभा चुनाव में मात्र लगभग 2 वर्ष ही शेष हैं, ऐसे में अभी से अपने टिकट के लिए आकाओं की जीहुजूरी तो करनी ही पड़ेगी।

