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मुंगेली कलेक्टोरेट – जहाँ कानून की उड़ रही धज्जियाँ, जिम्मेदारों के मुँह में ताले…छिपाई जा रही जानकारी…RTI बना मजाक

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स्वतंत्र तिवारी – 9752023023

​मुंगेली/ न्याय की उम्मीद लेकर पहुँचने वाले आम जनमानस के लिए मुंगेली कलेक्टोरेट इन दिनों ‘अंधेर नगरी’ साबित हो रहा है। जिस कार्यालय से जिले की प्रशासनिक व कानून व्यवस्था संचालित होती है, उसी की नाक के नीचे नियमों को ताक पर रखकर काम किया जा रहा है। आलम यह है कि सूचना का अधिकार (RTI) जैसा सशक्त कानून यहाँ महज एक मज़ाक बनकर रह गया है। आवेदकों ने बताया कि सूचना के अधिकार के तहत मुंगेली कलेक्टर कार्यालय में उन्हें जानकारी नही दी जाती।

​जिम्मेदारों के मुँह में ‘ताले’, जवाबदेही से किनारा…

​कलेक्टर कार्यालय में सूचना के अधिकार के तहत जब जानकारी मांगी जाती हैं, तो जिम्मेदार अधिकारियों के मुँह पर ताले लग जाते हैं। जनहित के मुद्दों पर चुप्पी साध लेना यहाँ की कार्यशैली का हिस्सा बन चुका है। आखिर ऐसी क्या मजबूरी हैं कि बड़े पदों पर बैठे अधिकारी तथ्यों को सामने रखने से कतरा रहे हैं ?

​RTI बना मज़ाक…जानकारी छिपाई या दबाई जा रही ?

​लोकतंत्र में पारदर्शिता के लिए RTI कानून बनाया गया था पर यह कानून मुंगेली कलेक्टोरेट की फाइलों में दम तोड़ रहा है। कलेक्टर कार्यालय में ​समय सीमा की अनदेखी की जा रही हैं आवेदन देने के महीनों बाद भी आवेदकों को जानकारी नहीं दी जा रही है। और यदि जवाब मिलता भी है, तो वह इतना अधूरा और भ्रामक होता है कि आवेदक खुद को ठगा सा महसूस करता है। सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी समय पर नहीं मिलने से कई संदेह उत्पन्न होते हैं। जब नियम – कानून की जानकारी देने वाले कार्यालय या अधिकारी ही उसे छिपाने लगें, तो आम आदमी कहाँ जाए ? जनता ने कहा कि मुंगेली कलेक्टोरेट में पारदर्शिता का गला घोटा जा रहा है।” RTI में जानकारी न देना ​भ्रष्टाचार की बू हैं या प्रशासनिक विफलता ?
​जानकारी छिपाने की यह कवायद स्पष्ट रूप से इशारा करती है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। पहले भी सूचना के अधिकार के कई आवेदनों की जानकारी कलेक्टर कार्यालय मुंगेली ने नहीं दी हैं जिसकी राज्य सूचना आयोग में प्रकरण लंबित हैं।

अब जनता का सवाल यह हैं कि क्या जिला प्रशासन और उच्च अधिकारी इस मनमानी पर संज्ञान लेंगे, या मुंगेली कलेक्टोरेट में इसी तरह कानून की धज्जियाँ उड़ती रहेंगी और जनता का विश्वास उठता रहेगा ?